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नई दिल्ली : अनुपम28 मई को कैराना और नूरपुर में उपचुनाव के लिए मतदान और 27 मई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बागपत में जनसभा,ये वो आखिरी दांव था,जिसके चमत्कार का भाजपा को हमेशा उम्मीद रहती है,और हो भी क्यूं न,हाल ही में कर्नाटका चुनाव में मोदी के रैलियों के असर से कैसे एका एक टीवी चैनलों में जहां कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बन कर दिख रही थी वो त्रिकोणीय हो गया और नतीजा आपके सामने है,

विपक्ष कि जातिगत ध्रुवीकरण,जिसमे पिछड़ गई बीजेपी

यूपी के चुनाव में मुख्य रूप से लोगों की नजरें जाट मतों पर टिकी थीं और जाटों ने आख़िरकार चौधरी चरण सिंह के बेटे अजीत सिंह को अपना नेता चुना और राष्ट्रीय लोकदल को वोट किया,इससे तो यही सामने आ रहा है कि जो लोग पिछले चुनाव में धर्म को केंद्र बना कर वोट किए थे वो अब जाती केन्द्रीत राजनीति के तरफ चल परा है.

किसानों का गुस्सा,मोदी की लोकप्रियता पर भाड़ी पर गई.

किसानों का गुस्सा सबसे ज़्यादा इस बात पर थी कि गन्ना किसानों का बकाया भुगतान वादे के मुताबिक नहीं हुआ यही वो वजह था जिसको लेकर किसान 27 मई को हुए मोदी के जनसभा से लगभग 6 किलोमीटर दूर बड़ौत तहसील मुख्यालय पर अपनी मांगों को लेकर एक हफ़्ते से धरना दे रहे थे.इसे संयोग ही कहा जा सकता कि जनसभा से एक दिन पहले धरना दे रहे किसानों में से एक की मौत हो गई,लेकिन किसानों का धरना फिर भी जारी रहा.मोदी के मन की बात से ज्यादा असर किसानो के इस विरोध को माना जा रहा है.

पार्टी के नेता भी सरकार से नाराज है.

पार्टी के जमीनी कार्यकर्ता के साथ साथ पार्टी के कुछ विधायक भी सरकार से नाराज है,किसी भी विधायक ने खुल कर तो विरोध नही किया है लेकिन उनका शिकायत है कि सरकार के प्रशासनिक अधिकारी उनकी बाते नही सुनते ठीक इसी प्रकार की नाराजगी की बातें 2 महीनें पहले गोरखपूर और फुलपूर के उपचुनाव के नतीजों के बात मीडिया मे सामने आई थी और फिर से आज की कई मीडिया रिपोर्टों में ये खबरें आई है,खुद बीजेपी की उम्मीदवार मृगांका सिंह से जब कुछ रिपोर्टरों ने इस बाबत सवाल किया तो उसने भी इस बात को स्विकारा है और इस बाबत मुख्यमंत्री से बात करने की बात कही.